कभी ख़्वाबों में दाद भी दे जाया करो

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शैलेन्द्र “उज्जैनी” [email protected]

बड़े हो तो इतना बड़प्पन भी दिखाया करो,
छोटी मोटी बातों में औकात पे मत आया करो।
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जब भी मुँह खोलते हो बर्बादी की ही बातें करते हो,
मसीहा हो…कभी किसी का घर भी तो बसाया करो।
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ये तो पता है सब से छुपकर पढ़ते हो मुझको,
ख्वाबों मे कभी आकर ज़रा दाद भी दे जाया करो।
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ठंड का समय था तो चल गया…अब तो सफाई रखना,
महीने मे एक बार नहीं अब दो बार तो नहाया करो।
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भ्रूण हत्या करके महिला उत्थान की बातें करते हो,
मेरी मानो नवरात्रे में तुम कन्या मत जिमाया करो।
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दिन-दिन भर हिचकियाँ आती रहती है मुझको,
आठों पहर में कभी तो हमको ज़रा भुलाया करो।
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सामने आते ही मेरे चेहरा लाल हो जाता है तुम्हारा,
ज़माने को खबर हो जाए…इतना भी तो ना शर्माया करो।
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जिसे देखो प्रवचन वाचक बना फिर रहा “उज्जैनी”
यूँ भेड़ों की तरह भीड़ के पीछे मत जाया करो।
                          

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