फादर्स डे स्पेशल : बाबा का सहारा | शैलेन्द्र ‘उज्जैनी’

न दौलत चाहिए ,न शोहरत चाहिए…. जिनको पकड़कर चलना सीखा था….. फिर उन उँगलियों का सहारा चाहिए… अकेला हो गया

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ग़ज़ल : इस आशिकी को मौत से भी ठान लेने दो | राजीव रंजन झा

  ये दुनिया जानती है तो उसे पहचान लेने दो उसे हक है वो जो माने उसे बस मान लेने

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कहानी: दो रूपये कम हैं | शैलेन्द्र “उज्जैनी”

आज बाहरवी का नतीजा आने वाला है. सब जगह मंदिरों में छात्र-छात्राओं की भीड़ उमड़ी पड़ी है. हो भी क्यों

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कहानी : नेक दिल चोर | शैलेंद्र “उज्जैनी”

चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था. एक अनजान सी बीमारी ने पूरे शहर को आगोश मे ले लिया था. सारे

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कविता : वो गुज़रा ज़माना याद आता है

अब भी वो गुज़रा ज़माना याद आता है, शाम जब भी बैठता हूँ तो दोस्त पुराना याद आता है। …..

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जो बुरे वक्त में काम आये वही मेरा पैगम्बर है | कविता

जितना मेरी आँखो में है बस उतना मंज़र मेरा है, मेरे लोटे में आ जाए बस उतना समंदर मेरा है।

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यूं ही नहीं मेरे शब्दों का जमाना दीवाना है

कोरोना तो महज एक बहाना है, असल मकसद तो कर्मफल चुकाना है। सालों से पिंजरे में कैद थी चिड़िया, अब

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मैं…

मैं …मैं राहगीर हूँ, तो राह भी मैं ही हूँ. मैं श्रमिक हूँ, तो श्रम भी मैं ही हूँ. मैं

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मैंने वक्त को बदलते देखा है

मैंने वक्त को बदलते देखा है, कल को आज और आज को कल में बदलते देखा है, तंग गलियों में

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