नारी: तुमसे ही है जीवन गाथा

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शैलेन्द्र “उज्जैनी” [email protected]

 

नारी तेरे संधर्ष की गाथा,
कोई लिख ना पाएगा,
जितना भी लिख लो,
यह किस्सा अधूरा रह जाएगा।

किसी के आँगन की कली है ये,
जाने किस चौखट की शान बनेगी,
तेरे इस बलिदान को कोई,
कभी समझ न पाएगा।

जिस दिन से जन्म लिया तूने,
एक पल न आराम मिला है,
तेरी जैसी ज़िदगी मिले तो,
नर एक दिन भी जी न पाएगा।

बेटों ने धोखे दिये,
माँ-बाप को घर से बाहर किया,
निश्छल प्रेम माँ-बाबुल से,
सिवा नारी कोई कर ना पाएगा।

सारी उम्र बस संघर्षों का दामन है,
और पीना है अपमान ,
शिव ने पिया था हलाहल,
सिवा तुम्हारे आज यह,
किसी और से पिया न जाएगा।

नारी तू इस धरा पर है इश्वर का प्रतिरूप ,
तू बेटी है, बहन है, माँ, दादी और नानी है।
शुरूआत भी तुम और अंत भी तुम्ही हो इस संसार का
तेरे संग-संग ही चलती यहाँ,
जीवन की कहानी है।

तेरे बिना यह संसार जी न पाएगा,
“उज्जैनी ” भी रो उठा है,
अब और लिख न पाएगा।

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