श्रद्धांजलि : जीवन बीत गया

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अभी आजादी का जश्न फीका भी नहीं हुआ था कि दिल्ली से एक ऐसी खबर आ गयी जिसने पूरे भारत को शोक में डुबो दिया. पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेई के निधन की खबर से शायद ही कोई भारतवासी दुखी न हो. अटलजी एक अच्छे नेता, एक अच्छे कवि और उससे भी बढ़कर एक अच्छे इंसान थे. उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए चारों तरफ दुआओं के हाथ उठ रहे थे. जगह जगह लोग हवन और प्रार्थना करते दिख रहे थे लेकिन मृत्यु भी एक ‘अटल सत्य’ जिसे एक दिन आना ही होता है. जीवन के इस सत्य को उनकी यह कविता ‘जीवन बीत चला’ बेहतर तरीके से प्रस्तुत करती है-

कल कल करते आज
हाथ से निकले सारे
भूत भविष्यत की चिंता में
वर्तमान की बाजी हारे

पहरा कोई काम न आया
रसघट रीत चला
जीवन बीत चला।

हानि लाभ के पलड़ों में
तुलता जीवन व्यापार हो गया
मोल लगा बिकने वाले का
बिना बिका बेकार हो गया

मुझे हाट में छोड़ अकेला
एक एक कर मीत चला
जीवन बीत चला।

अटल जी : जीवन परिचय

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के एक प्रतिष्ठित नेता थे. उन्हें सांस्कृतिक समभाव, उदारवाद और राजनीतिक तर्कसंगतता के लिए जाना जाता है. वे तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने. उनके कार्यकाल में ही भारत ने पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण किया. नई दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच शांति की उम्मीदों को नया आयाम दिया. उनकी सरकार ऐसी इकलौती गैर-कांग्रेस सरकार थी जिसने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. एक अनुभवी राजनीतिज्ञ और उत्कृष्ट सांसद होने के अलावा, अटल बिहारी वाजपेयी एक प्रसिद्ध कवि और सभी राजनीतिक दलों में सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्व भी थे.

नरेंद्र मोदी सरकार ने पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से अलंकृत करने की घोषणा की थी. उनके जन्मदिन 25 दिसंबर को ‘सुशासन दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है.अपनी वक्तृत्व कला के लिए प्रसिद्ध, वाजपेयी लम्बे समय से बीमार थे और इस वजह से काफी समय से सेवानिवृत्त जीवन जी रहे थे.

शुरुआती जीवन

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में मध्यमवर्गीय ब्राह्म परिवार में कृष्णा देवी और कृष्ण बिहारी वाजपेयी के घर हुआ था. उनके पिता एक कवि होने के साथ ही स्कूल में शिक्षक थे. वाजपेयी की शुरुआती पढ़ाई ग्वालियर के सरस्वती शिशु मंदिर में हुई. बाद में उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज ग्वालियर – अब लक्ष्मी बाई कॉलेज- से स्नातक की उपाधि ली. कानपुर के एंग्लो-वैदिक कॉलेज से वाजपेयी ने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की. वे 1939 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े और 1947 में उसके प्रचारक (पूर्णकालिक कार्यकर्ता) बन गए. उन्होंने इस दौरान राष्ट्रधर्म हिंदी मासिक, पांचजन्य हिंदी साप्ताहिक और दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे दैनिक अखबारों के लिए भी काम किया. वाजपेयी ने पूरी जिंदगी अविवाहित रहने का प्रण लिया था और रहे भी.

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राजनीतिक करियर

उन्होंने एक स्वंतत्रता संग्राम सेनानी के तौर पर करियर शुरू किया था. बाद में वे भारतीय जन संघ (बीजेएस) से जुड़े. यह एक हिंदू दक्षिणपंथी राजनीतिक दल था, जिसका नेतृत्व डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी करते थे. वे बीजेएस के राष्ट्रीय सचिव बने और उनके पास उत्तरी क्षेत्र का प्रभार था. बीजेएस के नए नेता के तौर पर, वाजपेयी 1957 में पहली बार बलरामपुर से लोक सभा के लिए चुने गए. वे 1968 में जन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. नानाजी देशमुख, बलराज मधोक और लालकृष्ण आडवाणी जैसे सहयोगियों की मदद से वाजपेयी ने जन संघ की पहुंच बढ़ाई.

1975 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने आंतरिक आपातकाल लागू किया था. विरोधियों का दमन हुआ था. इसके खिलाफ जय प्रकाश नारायण (जेपी) ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन शुरू किया, जिसमें वाजपेयी भी जुड़े. 1977 में जन संघ का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया. दरअसल, जनता पार्टी एक नया संगठन था जो इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ कई पार्टियों के एकजुट होने से बना था.

1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी ने पहली बार केंद्र में सरकार बनाई. उस समय वाजपेयी केंद्रीय मंत्री बने. उन्हें विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई. विदेश मंत्री के तौर पर, वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण देने वाले पहले व्यक्ति बन गए. 1979 में मोरारजी देसाई के इस्तीफे के बाद वाजपेयी का मंत्री पद का करियर भी खत्म हो गया. उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया. लेकिन तब तक, वाजपेयी ने खुद को एक दमदार राजनेता के तौर पर स्थापित कर चुके थे.

वाजपेयी ने लाल कृष्ण आडवाणी, भैरो सिंह शेखावत और बीजेएस के कुछ अन्य नेताओं के साथ मिलकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के समर्थन से 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन किया. वे कांग्रेस (आई) सरकार के मुख्य आलोचक हो गए, जो जनता पार्टी सरकार के गिरने के बाद फिर सत्ता में आई थी. वाजपेयी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार का कभी भी समर्थन नहीं किया और 1984 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सिख अंगरक्षकों के हाथों हत्या के बाद हुई सिख-विरोधी हिंसा का कड़े शब्दों में विरोध किया था.

भाजपा 1984 के चुनावों में सिर्फ दो सीटों तक सीमित हो गई थी. वाजपेयी भाजपा अध्यक्ष थे और संसद में विपक्ष के नेता भी. अपने उदारवादी विचारों की वजह से, वाजपेयी दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर दुख जताया और इसे भाजपा का ‘वर्स्ट मिसकैल्कुलेशन’ बताया था.

भारत के प्रधान मंत्री के तौर पर (1996 से 2004 तक)

1984 के चुनावों तक, भाजपा ने खुद को भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दल के तौर पर स्थापित कर लिया था. वाजपेयी ने 1996 के आम चुनावों के बाद देश के 10वें प्रधान मंत्री के तौर पर शपथ ली. उस समय लोक सभा चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. हालांकि, सरकार 13 दिन ही चल सकी क्योंकि वाजपेयी बहुमत हासिल करने के लिए अन्य पार्टियों का समर्थन नहीं जुटा सके. इस तरह वे भारत के सबसे कम अवधि के प्रधान मंत्री बन गए. भाजपा-नीत गठबंधन यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग या एनडीए) 1998 में फिर सत्ता में लौटा। वाजपेयी ने फिर प्रधान मंत्री के तौर पर शपथ ली.

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प्रधान मंत्री के तौर पर वाजपेयी के दूसरे कार्यकाल को राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण के लिए जाना जाता है, जो मई 1998 में किया गया था. वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया. उन्होंने ऐतिहासिक दिल्ली-लाहौर बस सेवा का फरवरी 1999 में उद्घाटन किया. उन्होंने पाकिस्तान के साथ कश्मीर समेत अन्य सभी विवादों को सुलझाने की महती पहल की थी. लेकिन पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध छेड़कर भारत को धोखा दिया. पाकिस्तानी सैनिक कश्मीर घाटी में घुसपैठ कर आए थे और उन्होंने कारगिल शहर के पास की सीमावर्ती चोटियों पर कब्जा जमा लिया था.

भारतीय सेना की इकाइयों ने ऑपरेशन विजय शुरू किया और कड़कड़ाती ठंड के बीच साहस और वीरता का परिचय देते हुए न केवल चोटी पर बैठे पाकिस्तानी दुश्मन को ठिकाने लगाया बल्कि उन इलाकों पर तिरंगा लहराकर देश की शान बढ़ाई. हालांकि, वाजपेयी की सरकार 13 महीने ही चली, जब अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) ने 1999 के बीच में सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. बाद के चुनावों में, हालांकि, एनडीए पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटा और वाजपेयी पांच साल का कार्यकाल (1999-2004) करने में सफल रहे. वे यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधान मंत्री भी बने. वाजपेयी ने 13 अक्टूबर 1999 को तीसरी बार भारत के प्रधान मंत्री के तौर पर शपथ ली थी.

दिसंबर 1999 में काठमांडू से नई दिल्ली आ रही इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी 814 को कुछ आतंकियों ने बंधक बना लिया था और वह उस फ्लाइट को कंधार (अफगानिस्तान) लेकर चले गए थे. यात्रियों की सकुशल रिहाई के लिए भारत सरकार को खूंखार आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर को जेल से छोड़ना पड़ा था. वाजपेयी के तीसरे कार्यकाल का उजला पक्ष यह है कि उस दौरान कई आर्थिक और अधोसंरचनात्मक सुधार किए गए. इनमें निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश को बढ़ावा देना शामिल था. नेशनल हाईवे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स और प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी कुछ योजनाएं शुरू की. वाजपेयी ने व्यापार-हितैषी, मुक्त-बाजार सुधार के साथ-साथ भारत के आर्थिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण फैसले लिए थे.

मार्च 2000 में, वाजपेयी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रवास के दौरान उनके साथ ऐतिहासिक विजन डॉक्यूमेंट पर हस्ताक्षर किए थे. इस घोषणा पत्र में कई रणनीतिक मुद्दे शामिल थे. इस दौरान मुख्य रूप से दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक रिश्तों को मजबूती देने की कोशिश की गई थी. वाजपेयी ने आगरा समिट के दौरान तत्कालीन पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ मिलकर पाकिस्तान के साथ एक बार फिर शांति बहाल करने की कोशिश की थी. लेकिन बातचीत विफल हो गई क्योंकि मुशर्रफ कश्मीर मुद्दे को अलग रखकर बातचीत आगे बढ़ाने के लिए तैयार ही नहीं हुए.

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वाजपेयी के कार्यकाल में 13 दिसंबर 2001 को भारत की संसद पर हमला हुआ था. पाक-समर्थिक आतंकवादियों ने दिल्ली में संसद परिसर में घुसने की कोशिश की थी. भारतीय सुरक्षा बलों ने उनकी कोशिश को नाकाम कर दिया था. 2002 में गोधरा रेल हादसे के बाद भड़के गुजरात दंगों की वजह से प्रधान मंत्री के तौर पर वाजपेयी बहुत दुखी हुए थे.

सेवानिवृत्ति

2004 के आम चुनावों में एनडीए का पतन हो गया. अपनी करीब आधी सीटें एनडीए हार गया. कांग्रेस-नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग या यूपीए) सत्ता में आया. वाजपेयी ने विपक्ष के नेता का पद लेने से इनकार कर दिया और इस तरह भाजपा का नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी के हाथों में आया.अटल जी को पद्म विभूषण (1992), कानपुर यूनिवर्सिटी से मानद डॉक्टरेट ऑफ फिलोसॉफी (1993) और भारत रत्न (2014) से सम्मानित किया जा चुका है.

राजनीतिक करियर

उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया. भारतीय जन संघ (बीजेएस) के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी से मिले और मुखर्जी के निधन के बाद बीजेएस का नेतृत्व संभाला. लालकृष्ण आडवाणी और भैंरोसिंह शेखावत जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की स्थापना की. पार्टी के शुरुआती पांच साल तक उन्होंने अध्यक्ष की भूमिका निभाई. 50 साल तक सांसद की भूमिका में रहे. 1957 से 10 बार लोकसभा सदस्य के तौर पर चुने गए और छह अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व किया
वे तीन बार भारत के प्रधान मंत्री चुने गए. 1996 में वाजपेयी पहली बार प्रधान मंत्री बने लेकिन सिर्फ 13 दिन के लिए. इस दौरान भाजपा अन्य पार्टियों का समर्थन जुटाने में नाकाम रही थी. 1998 में बतौर प्रधान मंत्री नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) सरकार का नेतृत्व किया लेकिन 13 महीने ही शासन में रहे क्योंकि अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडगम (एआईएडीएमके) ने समर्थन वापस ले लिया था. 1999 में उन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. वे केंद्र में सबसे ज्यादा वक्त तक प्रधान मंत्री रहने वाले पहले गैर-कांग्रेसी नेता बने. (13 अक्टूबर 1999 से 19 मई 2004) . खराब स्वास्थ्य के चलते वाजपेयी 2005 में राजनीति से रिटायर हुए.

उपलब्धियां

मई 1998 में वाजपेयी सरकार ने राजस्थान के पोखरण में पांच अंडरग्राउंड परमाणु परीक्षण किए थे. भारत-पाकिस्तान मैत्री के लिए उन्होंने ठोस प्रयास किए. उन्होंने 1999 में दिल्ली से लाहौर जाने वाली बस सेवा का शुभारंभ किया. उनकी सरकार ने कई आर्थिक सुधार किए. विदेशी निवेश और निजीकरण को बढ़ावा दिया.
गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सांप्रदायिक दंगों के बाद उन्होंने ‘राजधर्म’ का पालन करने की सलाह दी थी.

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