इनसे शादी के सपने देखती थीं लता मंगेशकर

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जम्मू रियासत के तहसीलदार अमरचंद सहगल के घर 11 अप्रैल 1904 को उनका जन्म हुआ था. जालंधर से वास्ता रखने वाले अमरचंद के दो बेटे थे – रामलाल और हज़ारीलाल. तीसरे का नाम रखा गया कुंदन लाल. सवा महीना बीता तो कुंदन की मां केसर अपनी देवरानी के साथ पहली बार घर से निकलीं. वहां तवी नदी के किनारे दोनों ने स्नान किया और पास में बनी मजार पर सलमान यूसुफ़ पीर के चरणों में कुंदन को रख दिया. वो एक पहुंचे हुए सूफी पीर और सूफी संगीत के ज्ञाता थे. कुंदन रोने लगा तो केसर चुप कराने लगी और पीर ने रोक दिया. कहा, उसे रोने दो. रोने से बच्चे का गला खुलता है, उसके फेफड़े मज़बूत होते हैं. कुछ देर के बाद उन्होंने कहा, ये बच्चा अपनी मां की तरह गायन वाले सुरीले संस्कार लेकर पैदा हुआ है और एक दिन बड़ा गायक बनेगा.

कुंदन बचपन से ही अपनी मां को रोज़ सुबह भजन गाते देखते थे. रात को उनसे लोरी सुनते तभी नींद लेते. स्कूल जाने लगे तो पढ़ाई में मन नहीं लगता लेकिन गाना सुनाने को कहो तो रेडी रहते थे. जंगल में चिड़िया का चहचहाना सुनते, गडरियों के लोकगीत सुनते, मजार पर सूफी गीत गूंजते, घऱ में भजन.. यहीं से संगीत उनमें परमानेंट हो गया. बड़े होने लगे तो मां के गाए भजनों को हूबहू वैसे ही गाकर सुनाने लगे. जीवन के आखिरी दिनों तक कुंदन धार्मिक रहे. उनके तीन बच्चे हो गए थे. वे सुनते रहते थे और कुंदन रोज भजन गाते थे. उन्हें शराब की बुरी लत लग चुकी थी लेकिन रोज सुबह उठकर हार्मोनियम लेकर बालकनी में बैठ जाते थे और दो भजन गाते थे – “उठो सोनेवालों सहर हो गई है, उठो रात सारी बसर हो गई है” और “पी ले रे तू ओ मतवाला, हरी नाम का प्याला.”

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बचपन में उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली लेकिन संघर्ष के दिनों में जरूर अलग-अलग जगह से सीखने की कोशिश करते रहे. कानपुर में वे पेट पालने के लिए दिन में रैमिंग्टन के टाइपराइटर बेचा करते थे. लेकिन शाम को उस्तादों के साथ संगत करते थे. भैरवी जैसे राग सीखते थे. इसी शहर में उनकी एक गुरु-मां बन गई थीं जिनसे वो ठुमरी और दादरा सीखते थे.

फिर वे कलकत्ता चले गए वहां घूम-घूमकर साड़ियां बेचने का काम किया. इसके बाद वे न्यू थियेटर्स स्टूडियो से जुड़े जहां से उनकी फिल्मी यात्रा शुरू हुई. यहां तक पहुंचने में सहगल को 13-14 साल लगे. कुछ वक्त बाद 16 जनवरी 1932 को फिल्मों में उनकी एंट्री हुई. वो फिल्म थी ‘मोहब्बत के आंसू’ से. वे हीरो भी थे और इसके गाने भी गाए थे. फिल्म नहीं चली. अगले साल उनकी चार फिल्में आईं जिनमें दो में उन्होंने भजन गाए थे. दो में एक्टिंग की. ‘पूरण भगत’ में उनके भजन बड़े लोकप्रिय हुए. लेकिन ये तीसरे साल आई फिल्म ‘चंडीदास’ थी जिसके बाद उन्हें पलटकर नहीं देखना पड़ा.
और ये 1935 का साल था जब एक सुपरस्टार के तौर पर उनका जन्म हुआ. फिल्म थी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के फेमस नॉवेल पर बनी ‘देवदास’.उनकी फिल्मों के गानों ने भी पूरे भारत में लोगों को दीवाना किया हुआ था. जैसे 1937 में आई फिल्म ‘प्रेसिडेंट’का ‘गाना इक बंगला बने न्यारा’.

इसके 32 साल बाद आई ब्लॉकबस्टर ‘दो रास्ते’ (1969) में बलराज साहनी का किरदार सहगल के इसी गाने को सुनता रहता है. कहानी भी घर बचाने के संघर्ष पर आधारित होती है. ये गाना उसका रेफरेंस पॉइंट था. इसी फिल्म में राजेश खन्ना भी थे जिन्होंने साहनी के सबसे छोटे भाई का रोल किया था. इस फिल्म में साहनी का पात्र जैसे फैन की तरह सहगल का ये गाना सुनता था, वो दीवानगी भारत भर के लोगों में रही.

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सहगल के स्टारडम का पहला दशक चल रहा था और एक बच्ची थी जो उनकी दीवानी थी. नाम था लता. लता मंगेशकर. आज जिन लता मंगेशकर की सिंगिंग मौलिकता और विशुद्धता का बहुत ऊंचा पैमाना है, वे लता म्यूजिक सीखने के शुरुआती वर्षों में सहगल की तरह गाने की कोशिश करती थीं. घर में फिल्मी गानों को गाना पसंद नहीं किया जाता था लेकिन लता को छूट थी. वे अपने पिता के साथ सहगल के गाने गाती रहतीं. सहगल की वे ऐसी दीवानी थीं कि उनसे शादी करने के सपने देखती थीं. लता ने एक बार बताया, “जितना मुझे याद आता है, मैं हमेशा से के. एल. सहगल से मिलना चाहती थी. बच्चे के तौर पर मैं कहती थी – जब बड़ी हो जाऊंगी तो उनसे शादी करूंगी. तब मेरे बाबा मुझे समझाते थे कि जब तुम शादी करने जितनी बड़ी हो जाओगी तो सहगल साब शादी की उम्र पार कर चुके होंगे.” लता को ये अफसोस हमेशा रहा कि वे जीवन में कभी सहगल से नहीं मिल पाईं. वे एक तरह से उनके परोक्ष म्यूजिक गुरु भी थे. जैसे कि हिंदी सिनेमा के लैजेंडरी सिंगर-एक्टर किशोर कुमार भी सहगल के बड़े प्रशंसक थे. वे भी सहगल को अपना म्यूजिकल गुरु मानते थे. वे पहले-पहल बंबई आए ही इसलिए थे कि बस एक बार सहगल से मिल सकें.

सहगल का स्टारडम कैसा था इसे दिलीप कुमार के शब्दों में मुकम्मल रूप में जान सकते हैं. नई पीढ़ी ने भले ही सहगल के गानों को मज़ाक का पात्र समझा हो लेकिन दिलीप साहब ने उसे यूं देखा था, “उनकी एक फिल्म थी जिसका नाम था ‘ज़िंदगी’. उस फिल्म का वो आखिरी दर्दनाक सीन मुझे कभी नहीं भूलता. जिसमें निहायत ही मतीन अंदाज में सहगल साब फिल्म की हीरोइन जमना की लाश के पास बैठे हुए थे और अपनी महबूबा की मौत का सारा कर्ब, सारी रूहानी तकलीफ उनके उस गाने में ढल गई, जो उन्होंने उस वक्त गाया थाः सो जा, सो जा, सो जा राजकुमारी सो जा.”इसी गीत को लता मंगेशकर ने भी गाया था, सुनते हुए रोएं खड़े होते हैं:

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सहगल ने हिंदी, बंगाली और तमिल भाषा की 36 फिल्मों में अभिनय किया था. ज्यादातर हिंदी थीं. उन्होंने 185 के करीब गाने गाए. इनमें 110 हिंदी और बाकी ज्यादातर बंगाली थे. जब 1937 में उनकी पहली बंगाली फिल्म ‘दीदी’ रिलीज हुई तो सामान्य और संभ्रांत दोनों वर्ग के दर्शक उनके मुरीद हो गए. एक समय में जब पंजाबी होने के कारण उनसे बंगाली गाने गवाने और एक्टिंग करवाने को लेकर साफ मना कर दिया, उन्हीं के बंगाली गायन को इस फिल्म में इतना पसंद किया गया कि खुद रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था, “तुम्हारा गला कितना सुंदर है.”

कलकत्ता और बंबई की फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने 15 साल काम किया. 1947 में उनकी आखिरी फिल्म ‘परवाना’ रिलीज हुई, उनकी मृत्यु के बाद. शराब ने उन्हें जिलाए भी रखा, और जीने भी नहीं दिया.

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