कहानी : नेक दिल चोर | शैलेंद्र “उज्जैनी”

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शैलेन्द्र “उज्जैनी” [email protected]

चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था. एक अनजान सी बीमारी ने पूरे शहर को आगोश मे ले लिया था. सारे अस्पताल खचाखच मरीजों से भरे हुए थे. शासन प्रशासन किसी को कुछ समझ नही आ रहा था. बीमारी पर काबू पाने का कोई रास्ता नही था. सारे उधोग धंधे बंद किये जा चुके थे. सारे कल-कारखानो मे ताले लगे हुए थे. यातायात के सभी साधन बंद थे. मकान मालिक पैसे ना देने के कारण किरायदारो को भगा रहे थे. ऐसे ही एक शहऱ में इमान नाम का शख्स भी विगत दो तीन माह से बेरोजगारी कि मार झेल रहा था. मकान मालिक ने किराया न देने के कारण पहले ही घर से बाहर निकाल दिया था. अब दो वक्त की रोटी के भी लांदे थे. इमान अगर अकेला होता तो शायद जैसे तैसे गुज़र कर भी लेता मगर उसके साथ उसका छोटा भाई भी था जो पैरो से विकलांग था. चलने फिरने मे बिल्कुल असमर्थ. अब इमान को बार-बार गाँव याद आ रहा था. ये मानवीय मनोविज्ञान ही है शायद कि मुसीबत के समय आदमी या तो अपनी माँ को याद करता है या जहाँ वो पैदा होता हे उस धरती माँ को.

आज सुबह से ही मोहल्ले मे बहुत चीख पुकार मची हुई है. ध्यान से सुनने पर पता चला कि पडोस के मास्टर साहब की साइकिल कही मिल नही रही है. पूरे मोहल्ले में खोजने के बाद भी जब साइकिल नहीं मिली. तो मास्टर साहब बहुत गुस्से में हैं. कल रात को अपने हाथो से बरामदे से सटे गालियारे मे खड़ी की थी साइकिल. मास्टर साहब परेशान होकर पुलिस चौकी पर चोरी कि रिपोर्ट लिखवाने जा ही रहे थे, कि क्या देखते हैं, आँगन में एक कागज़ का टुकड़ा हवा के झोके से ज़रा सरकता हुआ मास्टर जी के पैरो की तरफ़ बढ़ रहा है. मास्टर जी हौले से देखते हैं. शायद कागज़ पर कुछ लिखा है. कागज़ को पढ़ते-पढ़े मास्टर जी के चेहरे के भाव अचानक बदलने लगते हैं. जो चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था वो अब मायूस हो जाता है. मास्टर साहब मोहल्ले मे इकट्ठा भीड़ को ये कहकर जाने के लिए कहते हैं, “अरे मै तो भूल ही गया था मेरी साइकिल मेरा दोस्त कल माँग कर ले गया था. शायद आजकल मुझे ही कुछ याद नही रहता.” ये सुनकर सब अपने घर की ओर बढ़ चलते हैं. मास्टर साहब की पत्नी को बात हज़म नहीं होती. क्योंकि मास्टर जी का चेहरा उनके शब्दों का समर्थन नही कर रहा था. आखिर कागज़ के टुकड़े को मास्टर जी के हाथ से छीनते हुए वो पढ़ने लगती है ओर फफ़क -फफ़ककर रोने लगती है. कागज़ पर इमान के द्वारा साइकिल चोरी का जिक्र लिखा हुआ था. ओर ये भी लिखा था ये सब मैंने अपने विकलांग भाई को सही सलामत गांव पहुंचाने के लिए किया है. मास्टर जी भी इतने में पत्नी से आंख मिलते ही रो देते हैं. दोनों के चेहरे पर साइकिल चोरी हो जाने का जो संताप था वह अब चला गया था.

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