कविता : वो गुज़रा ज़माना याद आता है

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शैलेन्द्र “उज्जैनी” vshailendrakumar@ymail.com

अब भी वो गुज़रा ज़माना याद आता है,

शाम जब भी बैठता हूँ तो दोस्त पुराना याद आता है।

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पानी पीने का कहकर स्कूल से भाग जाते थे
बचपन का वो हर एक बहाना याद आता है।

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तीन रूपये कि एक कचोरी पाँच की दो मिलती,
उसको भी सबमे मिल बाँटकर खाना याद आता है।

…..

अब बाबा भी ना जाने क्यों आदर से बात करते है,
उनका अक्सर मुझको डाँट लगाना याद आता है।

…..

जाने क्यूँ स्वाद नही आता फल खरीद के खाने मे,
यारो संग वो अमरूद – आम चुराना याद आता है।

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