बुद्ध ने श्रावस्ति में दिखाये थे चमत्कार | बुद्ध पूर्णिमा 2020 | धर्म | wordtoword.in

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क्या आप जानते हैं कि बुद्ध ( buddha )  उड़ भी सकते थे. ऐसा हम नहीं कह रहे, दरअसल जातक कथाओं ( Jatak katha )  में इसका वर्णन है. इस साल 7 मई को बुद्ध पूर्णिमा ( buddha purnima )  है. यह दिन बहुत ही खास है, क्योंकि  इसी दिन भगवान बुद्ध ( buddha )  का जन्म हुआ था, इसी दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और इसी दिन उनका महानिर्वाण भी हुआ था. दरअसल आज हम आपको भगवान बुद्ध ( buddha ) से संबंधित कुछ ऐसी कहानियां बतायेंगे, जिसे आपमें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना होगा.

दरअसल बुद्ध की कई कथाओं में चमत्कारों के बारे में बताया गया है. यहां भी हम आपको ऐसी ही एक कथा बताने जा रहे हैं. बिहार के प्रमुख पर्यटन स्थल को उस समय राजगृह के नाम से जाना जाता था. एक बार एक बौद्ध भिक्षु पिंडोल भारद्वाज राजगीर में घूम रहे थे. वहां उन्होंने देखा कि एक व्यक्त्ति ऊंची लकड़ी पर चंदन का कटोरा लटकवा रहा था. उन्होंने इसका कारण जानना चाहा तब, पता चला कि उस व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्तियों और सिद्ध सन्यासियों पर विश्वास नहीं था. इसी कारण सन्यासियों का मजाक उड़ाने के लिए वह ऐसा कर रहा था. तब उन्होंने सोचा कि इसके अहंकार को तोड़ना चाहिए. तब बौद्ध भिक्षु उड़ते हुए लकड़ी के ऊपरी सिरे पर पहुंचे और कटोरे को उतार लिया. वह व्यक्ति यह देख कर हतप्रभ रह गया. लेकिन उसके बाद बौद्ध भिक्षु द्वारा दिखाये गये इस चमत्कार की चर्चा लोगों के बीच में होने लगी. तब भगवान बुद्ध ने सभी भिक्षुओं को आदेश दिया कि आम लोगों के बीच इस तरह चमत्कार न दिखाएं.
चूंकि बौद्ध भिक्षुओं ने चमत्कार दिखाना बंद कर दिया, तब कुछ छोटे-मोटे संन्यासी चमत्कार दिखाते और बौद्ध भिक्षुओं को पाखंडी कहने लगे. जब मगध के राजा बिंबिसार को इसका पता चला, तो वे भगवान बुद्ध के पास पहुंचे और उनसे श्रावस्ति में चमत्कार दिखाने की प्रार्थना की. तब भगवान बुद्ध ने बिंबिसार की प्रार्थना स्वीकार की और श्रावस्ति पहुंचे. कहा जाता है कि वहां उन्होंने रत्नों की एक छत बनायी और उड़ते हुए वहां तक पहुंचे. कुछ लोक मान्यताओं के अनुसार वे एक साथ हजारों रूपों में प्रकट हो गये. बुद्ध के इन चमत्कारों के कारण उनके आलोचक श्रावस्ति छोड़ कर भाग गये.

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यह तो थी उनकी एक कहानी. एक दूसरी कहानी भी बहुत प्रचलित है.
संबोधि प्राप्ति के पांचवें वर्ष में बुद्ध वैशाली के कूटागारशाला में थे. एक दिन उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि उनके पिता की मृत्यु नजदीक है. यह समय उनके पिता को धर्म का उपदेश देने के लिए उपयुक्त था. मगर वहीं उनके सामने एक समस्या भी खड़ी थी. दरअसल कपिलवस्तु के शाक्य और कोलनगर के कोलों के बीच रोहिणी नदी के जल को लेकर विवाद चल रहा था, जो बहुत ही भयंकर साबित होता. इसलिए उनके विवाद को निबटाना भी था. तब भगवान बुद्ध उड़ते हुए कपिलवस्तु पहुंचे और पिता को धर्म का उपदेश दिया. उसके बाद उनके पिता का निधन हो गया. उसके बाद उन्होंने शाक्य और कोलों के मामले को भी सुलझाया और युद्ध को टाल दिया. इससे हजारों लोगों की जान बच गयी.

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