पूजा में जलाई अगरबत्ती तो आएगा यह संकट

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पूजा-पाठ के दौरान अगरबत्ती का इस्तेमाल किया जाता है। क्योंकि बिना इसके पूजा की कल्पना भी नहीं की जाती है। बहुत से लोग मानते हैं कि अगर घर के मंदिर में हर रोज एक अगरबत्ती जला दी जाए तो एक तरह से पूजा सम्पन्न हो जाती है। आज-कल के भागदौड़ वाली जिंदगी में जब पूजा पाठ का समय लोगों के पास कम ही है, अगरबत्ती का महत्व काफी बढ़ गया है। लेकिन शायद ये बात कम लोग जानते हैं कि पूजा-पाठ में अगरबत्ती जलाना धार्मिक दृष्टिकोण से अशुभ माना जाता है।

दरअसल बहुत सारी कंपनियां अगरबत्ती बनाने में बांस का इस्तेमाल करती हैं। जिसके बाद बांस की पतली सी लकड़ी पर सुगंधित लेप लगाया जाता है। कहते हैं कि सारी मुसीबत की जड़ बांस की पतली सी लकड़ी है। जबकि हिन्दू धर्म में बांस को जलाना वर्जित है। किसी भी हवन या पूजा में बांस को नहीं जलाया जाता है। यहां तक कि चिता में भी बांस की लकड़ी का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

अर्थी के लिए बांस का इस्तेमाल जरूर किया जाता है लेकिन उसे जलाया नहीं जाता। वहीं कई ग्रन्थों में यह भी लिखा गया है कि बांस को जलाने से पितृ दोष लगता है। एक शोध में हमारे पूर्वजों द्वारा बांस न जलाने की परंपरा को सही साबित किया गया है। हमारे देश के नहीं बल्कि इटली के दो शोधकर्ताओं ने अपने शोध में यह दावा किया है कि अगरबत्ती हमारी सेहत के लिए बहुत हानिकारक है।

 सिगरेट से भी ज्यादा खतरनाक है अगरबत्ती का धुआ

अगरबत्ती को लेकर 2013 में एक शोध किया गया था और यह दावा किया गया था कि अंगरबत्ती या धूपबत्ती से निकलने वाला धुआं सिगरेट से निकलने वाले धुएं से ज्यादा नुकसानदेह होता है। अगरबत्ती और धूपबत्ती का इस्तेमाल लोगों के घरों, मजारों और मंदिरों में बहुतायत मात्रा में किया जाता है। सुगंधित धुओं वाले अगरबत्ती को आस्थामय माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन सबको इस बात का पता नहीं है कि अगरबत्ती और धूपबत्ती से उठने वाला धुआं आपको श्वसन संबंधी दिक्कतों के अलावा सरदर्द, दिल की बीमारी या फिर कैंसर तक का शिकार बना सकता है। एक रिसर्च में कहा गया है कि अगरबत्ती से निकलने वाली कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर डाइ ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड किसी के भी फेफड़ों को खराब कर सकती हैं। इसका प्रभाव बिल्कुल सिगरेट के धुएं जैसा होता है। शोध में ऐसे दो तरह की अगरबत्तियों का इस्तेमाल किया गया था जो तकरीबन 96 प्रतिशत घरों में इस्तेमाल की जाती थीं। इन अगरबत्तियों को तीन घंटे तक जलाकर एक कमरे में मानवीय फेफड़ा-कोशिकाओं के साथ रखा गया था। तकरीबन 24 घंटे बाद जब ह्यूमन लंग्स सेल्स की जांच की गई तो पाया गया कि इससे निकलने वाली गैसें फेफड़ों को खराब करने की क्षमता रखती हैं।इस शोध से पूर्व 2008 में हुए एक शोध में भी यह बात सामने आई थी कि अगरबत्तियों का इस्तेमाल रेस्पिरेटरी कैंसर का कारण हो सकता है। इसके अलावा अगरबत्ती का धुआं अस्थमा के मरीजों के लिए भी काफी खतरनाक होता है। जिन घरों में नियमित तौर पर अगरबत्ती और धूपबत्ती का इस्तेमाल होता है वहां रहने वाले लोगों में अक्सर अस्थमा के लक्षण देखें जाते हैं।

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