शिव शंकर के प्रसाद में मिला कैंसर का इलाज

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काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) कैंसर, मिर्गी और सिकल सेल एनीमिया (खून की कमी) जैसी बीमारियों के इलाज के लिए भांग के औषधीय इस्तेमाल पर रिसर्च कर रही है. सीएसआईआर और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (आईआईआईएम) को जम्मू-कश्मीर सरकार से शोध कार्यक्रम का संचालन करने का लाइसेंस मिला है. इसपर काम शुरू हो चुका है. इंसानों पर ड्रग के रूप में भांग के उपयोग की मंजूरी के लिए ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया से बातचीत भी शुरू हो चुकी है.

भांग की खेती में क्या है रुकावटें

बॉम्बे हेम्प कंपनी (बोहेको) के सहयोग से CSIR-IIIM को भांग उगाने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने अप्रैल 2017 में लाइसेंस जारी किया था. प्राथमिक तौर पर भांग से मिलने वाली दवा का परीक्षण सबसे पहले मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में किया जाएगा.
मिर्गी जैसे क्रोनिक रोगों के इलाज में भांग से बनने वाली ये दवाइयां असरदार साबित हो सकती हैं. कई अनुसंधान से पता चला है कि भांग का दुष्प्रभाव नगण्य होता है, जबकि औषधीय गुणों के कारण मानसिक रोगों के अलावा कैंसर के इलाज में भी इससे बनी दवाइयों का इस्तेमाल हो सकता है. भांग में टेट्रा हाइड्रो कैनाबिनोल (टीएचसी) नाम का एक रसायन होता है, जिससे नशा होता है. इसके अलावा भांग में सारे औषधीय गुण होते हैं. टीएचसी का उपयोग दर्द निवारक दवाओं में किया जाता है, जो कैंसर से पीड़ित मरीजों को दर्द से राहत दिलाने में असरदार होती है. दवाई बनाने के लिए भांग की खेती करने की जरूरत है, लेकिन वर्तमान नारकोटिक्स कानून में भांग की पत्ती और फूल दोनों को शामिल किए जाने से इसमें रुकावट आ रही है. अतः जरूरत है कि ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिससे अनुसंधान के उद्देश्य से भांग की खेती करने की अनुमति हो. एनडीपीएस अधिनियम, 1985 की धारा 10 (2) (डी) के तहत जो रोक है, उसके मुताबिक भांग की पैदावार करने वालों को राज्य सरकार के अधिकारियों के यहां भांग को जमा कराना होता है और यह चिकित्सकीय एवं वैज्ञानिक उद्देश्य के लिए भांग के पौधों की पैदावार करने की दिशा में एक बड़ी बाधा है. भांग की खेती करने के संबंध में एनडीपीएस नियम बनाने के मामले में कई राज्य सरकारों की विफलता भी एक बड़ी रुकावट है.
बोहेको की स्थापना 2013 में की गई थी. यह सीएसआईआर के साथ साझेदारी में भांग के चिकित्सा और औद्योगिक उपयोग का अध्ययन करने वाला भारत में पहला स्टार्टअप है. काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर ) कैंसर, मिर्गी और सिकल सेल एनीमिया (खून की कमी) जैसी बीमारियों के इलाज के लिए भांग के औषधीय इस्तेमाल पर रिसर्च कर रही है.

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गांजे के प्रयोग से भी करीब 15,000 प्रोडक्ट्स बनाए जा सकते हैं, जिनका इस्तेमाल कई तरह की दवाइयों के तौर पर किया जा सकता है.हमारे पूर्वज अनादि काल से भांग और गाजे का सेवन करते आए हैं. यहां तक कि भागवान शंकर को भी भांग चढ़ाया जाता है. इस प्रकार पहले कभी भांग और गांजे के सेवन को लेकर कोई समस्या नहीं आई, लेकिन इस क्षेत्र में माफिया की पैठ होने पर समस्या गंभीर बन गई है. ड्रग माफिया युवाओं में नशाखोरी को बढ़ावा दे रहा हैं.

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