प्रकाशपर्व विशेष: गुरुनानक देव के जीवन से जुड़े कुछ किस्से

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प्रकाश पर्व के मौके पर पटना साहिब की रौनक काफी बढ़ जाती है. देश विदेश से यहाँ श्रद्धालु आते हैं और अपने आप को धन्य पाते हैं. जहाँ जहाँ गुरुनानक देव के चरण पड़े हर उस जगह पर श्रद्धालु पहुँचते हैं. प्रकाशपर्व के इस मौके पर सिखों के प्रथम गुरु गुरुनानक देव के जीवन से जुड़े कुछ किस्से यहाँ प्रस्तुत हैं.

उत्तराखंड के चम्पावत जिले के पाटी विकास खंड में लधिया और रतिया के संगम में स्थित रीठा साहिब गुरुद्वारा सिखों का प्रमुख तीर्थ स्थल है. यहां सिखों के प्रथम गुरु नानक देव अपने शिष्य मरदाना के संग चौथी उदासी के वक्त पहुंचे थे. इस दौरान उन्होंने कड़वे रीठे को मिठास देकर इस स्थान को प्रमुख तीर्थ स्थल में बदल दिया था.

रीठा साहिब गुरुद्वारा जिला मुख्यालय चम्पावत से करीब 72 किमी दूर है. वर्ष 1501 में श्री गुरुनानक देव अपने शिष्य मरदाना के साथ रीठा साहिब आए। इस दौरान उनकी मुलाकात सिद्ध मंडली के महंत गुरु गोरखनाथ के शिष्य ढेरनाथ से हुई. इस बीच गुरुनानक और ढेरनाथ के संवाद के बीच शिष्य मरदाना को भूख लगी. जब भोजन न मिला तो निराश शिष्य गुरुनानक देव के पास पहुंचा. गुरु नानक देव ने शिष्य को सामने रीठे के पेड़ को छूकर फल खाने का आदेश दिया. रीठा कड़वा होता जानकर मरदाना ने गुरु के आदेश का पालन करते हुए जैसे ही रीठे को खाया, वह मीठा हो गया. तब से इस स्थान का नाम रीठा साहिब पड़ गया. तब से यहां श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में मीठा रीठा बांटा जाता है. मई-जून में लगने वाले जोड़ मेले में सबसे ज्यादा श्रद्धालु रीठा साहिब गुरुद्वारे में पहुंचते हैं.

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एक और घटना के अनुसार जब गुरु नानक देव जी सिकंदर लोधी के समय में पहली पूरब की यात्रा पर दिल्ली आए थे. तब उन्होंने जी.टी रोड स्थित सब्जी मंडी के बाग में विश्राम किया था. मुख्य सड़क होने की वजह से यहां से बड़ी संख्या में लंबा सफर तय करने वाले मुसाफिर गुजरते थे. प्यासे मुसाफिरों की प्यास बुझाने के लिए उन्होंने कुएं पर प्याऊ का प्रबंध किया था. जिस कारण इस जगह को गुरुद्वारा नानक प्याऊ के तौर पर जाना जाने लगा. गुरु जी उनके लिए लंगर का आयोजन भी करते थे. फिर धीरे-धीरे दिल्ली के निवासी उनके दर्शन के लिए यहां पर पहुंचने लगे.

इस गुरुद्वारे में आने वाले श्रद्धालु कुएं के पानी को घर लेकर जाते हैं, जो उनके लिए अमृत सामान है. कुएं से मोटर के माध्यम से पानी निकाला जाता है. प्रकाशोत्सव के मौके पर कुएं को खासतौर पर सजाया जाता है. जिसकी छटा देखते ही बनती है. यहां मत्था टेकने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं. प्रकाशोत्सव की पूर्व संध्या से ही श्रद्धालु गुरुद्वारे में मत्था टेकने के लिए पहुंचने लगते हैं. प्रकाशोत्सव पर श्रद्धालुओं के लिए यहां विशेष इंतजाम किया जाता है. यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं.

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