कारगिल: जहाँ शहीद हुए थे कैप्टन विक्रम बत्रा, 20 साल बाद वहीं पहुंचा जुड़वा भाई

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चॉपर से पहला पैर नीचे रखा ही था कि भीतर कई सवाल उठने लगे. विक्रम कहां खड़ा था, किस किनारे से बंकर पर छलांग लगाई थी, कहां से उसने आमने-सामने की लड़ाई में तीन पाकिस्तानियों को मार गिराया था? कितने बंकर थे? कितनी गोलियां चली थी? कैप्टन विक्रम बत्रा के भाई विशाल बत्रा 20 साल बाद बत्रा टॉप पर पहुंचे.

जब भी करगिल युद्ध की बात होती है,तो कैप्टन विक्रम बत्रा का नाम अपने आप ही आ जाता है. कैप्टन विक्रम बत्रा करगिल युद्ध में अभूतपूर्व वीरता का परिचय देते हुए शहीद हुए थे. उन्हें मरणोपरांत वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया है.

करगिल युद्ध को 20 साल बीत चुके हैं. 20 साल बाद कैप्टन विक्रम बत्रा के जुड़वा भाई विशाल बत्रा उस चोटी पर पहुंचे, जहां 7 जुलाई 1999 को बत्रा शहीद हुए थे. इस चोटी को अब ‘बत्रा टॉप’ के नाम से जाना जाता है. इस यात्रा के बाद विशाल बत्रा ने अपने जज्बात एक जाने माने अखबार से साझा किये. जिसे हम यहाँ उसी रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं.

20 साल से देख रहा था सपना

विशाल बत्रा बताते हैं कि 20 साल में उन्होंने कई बार बत्रा टॉप पर जाने का सपना देखा. कई बार इस ख्वाहिश को विक्रम के ऑफिसर्स से साझा किया. विशाल ने बताया कि ले. जनरल वाईके जोशी जो करगिल युद्ध के दौरान विक्रम के कमांडिंग ऑफिसर थे, इन दिनों सेना के 14वीं कोर के जीओसी हैं. उन्हीं के इलाके में करगिल भी आता है, उन्हीं की बदौलत इस साल ये सपना पूरा हुआ.

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पूरी रात एक्साइटमेंट में सो नहीं पाया

विशाल बत्रा चढ़ाई करके बत्रा टॉप तक जाना चाहते थे, लेकिन दिक्कतों के चलते उन्हें एयरड्रॉप करने का फैसला किया गया. उन्होंने बताया कि बत्रा टॉप पर जाने की एक्साइटमेंट में मैं पूरी रात सो नहीं पाया. चॉपर से पहला पैर नीचे रखा ही था कि भीतर कई सवाल उठने लगे. विक्रम कहां खड़ा था, किस किनारे से बंकर पर छलांग लगाई थी, कहां से उसने आमने-सामने की लड़ाई में तीन पाकिस्तानियों को मार गिराया था? कितने बंकर थे? कितनी गोलियां चली थी? कहां आखिरी सांस ली थी? मैं पूछते चले जा रहा था. पहले भी मैं कितनी बार विक्रम की लड़ाई के बारे में पूछ और सुन चुका था, लेकिन वहां अपनी आंखों से देखा तो सबकुछ पहली बार ही मालूम हो रहा है.

20 साल बाद इसी जगह से मम्मी-पापा को फोन किया

विशाल बत्रा ने बताया कि कैप्टन विक्रम बत्रा ने 26 जून 1999 को आखिरी बार मम्मी-पापा से सैटेलाइट फोन पर बात की थी. कुछ दिन बाद वह पॉइंट 4875 को जीतने के अपने अगले मिशन की तरफ निकल पड़े. 5 जुलाई को 1999 को उसकी टीम ने चढ़ाई शुरू की थी. 7 जुलाई 1999 को चोटी पर तिरंगा फहराया जा चुका था. इसी दिन विक्रम शहीद हुए थे. विशाल कहते हैं मैंने इसी जगह से मम्मी-पापा को फोन किया. फोन उठाते ही पापा ने पूछा कहां हो? मैंने जवाब दिया बत्रा टॉप से बोल रहा हूं. काश ये फोन विक्रम ने किया होता.

रोना चाहता था पर नहीं रोया

विशाल बत्रा बताते हैं कि वे बत्रा टॉप पर पहुंचकर कुछ देर अकेले चुपचाप एक कोने में खड़े रहे. वे कहते हैं कि मैं विक्रम को महसूस करना चाहता था. उन पत्थरों को छूकर देखा, जिन पत्थरों को 20 साल पहले मेरे भाई ने छुआ होगा. उस वक्त जब उसकी सांसें चल रहीं होगी. उस वक्त जब वह इस चोटी पर तिरंगा फहरा रहा होगा. मैं वहां जोर-जोर से रोना चाहता था, लेकिन मैं नहीं रोया, क्योंकि वहां मेरा भाई हंसते-हंसते लड़ा था. अपने आखिरी वीडियो में भी हंसते हुए नजर आ रहा था. जब तिरंगे में लिपटा घर पहुंचा तो ताबूत में भी चेहरा मुस्कुराता हुआ था. फिर उससे मिलकर मैं कैसे रोता?

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