यहाँ पीरियड के दौरान लड़कियां करती हैं ऐसा काम

Spread the love

27 साल की लौरा टेक्सीरिया हर महीने माहवारी के दौरान निकलने वाले ख़ून को इकट्ठा करके वह अपने चेहरे पर लगाती हैं. इसके बाद बचे हुए ख़ून को पानी में मिलाकर अपने पेड़ों में डालती हैं. ‘सीडिंग द मून’ नाम की ये प्रथा कई पुरानी मान्यताओं से प्रेरित है, जिनमें माहवारी के ख़ून को उर्वरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता था.

इस प्रथा को मानने वाली महिलाएं अपने पीरियड को अपने ही अंदाज़ में जीती हैं. लौरा जब अपने पेड़ों में पानी डालती हैं तो एक मंत्र का जाप करती हैं,  जिसका मतलब है- मुझे माफ़ करना, मैं आपसे प्यार करती हूं और आपकी आभारी हूँ. लौरा कहती हैं कि जब वह अपने ख़ून को अपने चेहरे और शरीर पर लगाती हैं तो वह सिर्फ़ आँखें बंद करती हैं और शुक्रगुज़ार महसूस करती हैं, और अपने अंदर शक्ति का संचार होते हुए महसूस करती हैं.

ताक़त देने वाली प्रथा

लौरा के लिए ये प्रथा महिलाओं को सशक्त बनाने से भी जुड़ी हुई है. देखा जाए तो समाज में सबसे बड़ा भेदभाव मासिक धर्म से जुड़ा हुआ है. समाज इसे ख़राब मानता है. सबसे बड़ा शर्म का विषय भी यही है क्योंकि महिलाएं अपने पीरियड के दौरान सबसे ज़्यादा शर्मसार महसूस करती हैं.

साल 2018 में ‘वर्ल्ड सीड योर मून डे’ इवेंट को शुरू करने वालीं बॉडी-साइकोथेरेपिस्ट, डांसर और लेखक मोरेना कार्डोसो की मानें तो महिलाओं के लिए सीडिंग द मून एक बहुत ही सरल और उनके मन को शक्ति देने वाला तरीक़ा है. बीते साल इस इवेंट के दौरान दो हज़ार लोगों ने अपनी माहवारी के दौरान निकले ख़ून को पेड़ों में डाला था. इस कार्यक्रम के आयोजन का मकसद ये था कि लोग ये समझें कि माहवारी के दौरान निकलने वाला ख़ून शर्म का विषय नहीं है बल्कि ये सम्मान और ताक़त का प्रतीक है.

READ  ऐसा क्या किया इस मासूम परिंदे ने कि पुलिस को इसे गिरफ्तार करना पड़ा

कैसे शुरुआत हुई बदलाव की

उत्तरी अमरीका (मेक्सिको समेत) और पेरू में ज़मीन पर माहवारी के दौरान निकलने वाले ख़ून को ज़मीन पर फैलाया गया ताकि उसे उर्वर बनाया जा सके. दूसरे समाजों में खासकर भारत में पीरियड के दौरान निकलने वाले ख़ून को लेकर एक बहुत ही नकारात्मक रुख़ है. माहवारी को बेकार का ख़ून बहना माना जाता है और इसे मल और मूत्र की श्रेणी में रखा जाता है जिसे लोगों की नज़रों से दूर बाथरूम में बहाना होता है. 1960 में महिलावादी आंदोलनों ने इस सोच को बदलने की कोशिश की थी और महिलाओं को उनके शरीर के बारे में खुलकर बात करने के लिए प्रोत्साहित किया गया.  इसके बाद कई कलाकारों ने माहवारी से निकले ख़ून के प्रतीक का इस्तेमाल अपने राजनीतिक, पर्यावरणीय, सेक्शुअल और लैंगिक विचारों को सामने रखने में किया.

सीडिंग माई मून प्रथा लोगों को पृथ्वी को एक बड़े गर्भाशय के रूप में देखने में मदद करने की कोशिश करती है. इस विशाल धरती में भी अंकुरण होता है जिस तरह महिलाओं के गर्भाशय में होता है.

आज भी यह विषय वर्जित

दुनिया भर में 14 से 24 साल के बीच की उम्र वाली 1500 महिलाओं पर किए गए सर्वेक्षणों में सामने आया है कि कई समाजों में आज भी ये विषय वर्जनाओं में शामिल है. जॉन्सन एंड जॉन्सन ने ब्राज़ील, भारत, दक्षिण अफ़्रीका, अर्जेंटीना और फिलीपींस में ये अध्ययन किया.  इस अध्ययन में सामने आया कि महिलाएं सेनिटरी नैपकिन ख़रीदने में शर्म महसूस करती हैं. इसके साथ ही पीरियड के दौरान महिलाएं अपनी सीट से उठने में भी शर्म महसूस करती हैं. इस विषय से जुड़ी शर्म को दूर करने के लिए ज़रूरी है कि महिलाएं इस बारे में बात करें और आजकल की महिलाएं अपनी माहवारी को लेकर शर्मसार नहीं दिखती हैं.

READ  क्या है 'द मोमो चैलेन्ज' जिसके चलते बच्चे कर रहे हैं सुसाइड

क्या कहती हैं इस प्रथा जुडी लड़कियां

ये एक ऐसी प्रथा थी जिसके लिए सभी लोग तैयार नहीं हैं, या शायद बेहद कम लोग तैयार हैं. एक लडकी अपने अनुभव को साझा करते हुए वह बताती हैं, इंस्टाग्राम पर सिर्फ 300 लोग मुझे फॉलो करते थे. मैंने इस प्रथा का अनुसरण करने के बाद अपनी एक तस्वीर पोस्ट की. लेकिन चार दिन बाद इंस्टाग्राम पर मेरा मज़ाक उड़ाया गया. ब्राज़ील के एक विवादित कॉमेडियन डेनिलो जेन्टिलि ने इस तस्वीर को अपने 16 मिलियन फॉलोअर्स के साथ साझा किया. लेकिन उन्होंने लिखा, “पीरियड के दौरान निकलने वाला ख़ून सामान्य है लेकिन उसे अपने चेहरे पर लगाना असामान्य है.” इस पोस्ट पर 2300 से ज़्यादा कमेंट्स आए जिनमें से ज़्यादातर नकारात्मक थे.

ये किस्सा बताता है कि ये विषय आज भी कितना वर्जित है.  लोग सोचते हैं कि अगर कोई चीज़ उनके लिए सामान्य नहीं है तो वह चीज़ ज़रूर ही एक ग़लत होगी. वह सोचते हैं कि वह अपने मोबाइल फोनों के पीछे छिपकर किसी को गालियां दे सकते हैं. लेकिन ये मेरे शरीर से निकला तरल पदार्थ है और ये मैं तय करूंगी कि कौन सी चीज असामान्य है और कौन सी चीज़ नहीं. मैं किसी अन्य व्यक्ति की ज़िंदगी में हस्तक्षेप नहीं कर रही हूं. लोगों को भद्दी गालियां दिया जाना असामान्य होना चाहिए. मैं उस दिन ये करना बंद करूंगी जब लोग पीरियड के दौरान निकले ख़ून को प्राकृतिक चीज़ की तरह देखना शुरू कर दें.

Image by Alexandr Ivanov from Pixabay

ब्रह्म मुहूर्त में जागते थे श्रीराम, जानें फायदे ( Brahma muhurta ke Fayde) , देखें यह वीडियो


हमारे यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें।

Spread the love
Do NOT follow this link or you will be banned from the site! © Word To Word 2021 | Powered by Janta Web Solutions ®
%d bloggers like this: