अनकही

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शैलेन्द्र “उज्जैनी” [email protected]

बिन बोले ही मेरी बातों को वो कैसे जान जाता है,
बिन शब्दों की जुबान को पढ़ना शायद उसे आता है।
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कहता फिरता है कि मुझे कभी याद नहीं करता वो,
समझ नहीं आता तकिया रोज़ धूप में क्यों सुखाता है
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कहीं दुपट्टा भी कंधे से ज़रा खिसकता नही है लोगों,
ये शहर में लड़कियों की चुनरियाँ कौन चुरा जाता है?
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साथ वालों का तो गुजारा भी मुश्किल से चलता है
उसी मद पर हर साल नई कार कहाँ से लाता है?
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बचपन कहाँ परवाह करता है गम-ए-बरसात की
जवानी आते-आते जुड़ जाता ग़मों से ही नाता है।
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वो आगे -आगे और हम पीछे -पीछे भागते फिरते हैं,
खुशियों से क्या हमारा बस इतना ही नाता है?
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अब कहाँ पहले सा सोने की चिड़ियाँ वाला हिन्दोस्तान ,
सालों हुए चिड़ियों का झुंड भी नजर नही आता है।
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किस- किस को कोसे “उज्जैनी” ओर किसकी बात करे,
बेतरतीब* उतारा कागज़ पर लिखना उसे कहाँ आता है?
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* बिना तरीके से (आड़ा तिरछा काम)

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